श्री गुरु गोबिन्द सिंह जयन्ती

श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी सिक्खों के दसवें गुरु थे वे एक गुरु ही नहीं बल्कि एक महान दार्शनिक, प्रख्यात कवि, निडर एवं निर्भीक योद्धा, अनुभवी लेखक और संगीत के पारखी भी थे। वे एक महान् शूरवीर और तेजस्वी नेता थे उन्होंने मुगलों के अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाई थी औरसत श्री अकालका नारा दिया था उन्होंने कायरों को वीर और वीरों को सिंह बना दिया था काल का अवतार बनकर उन्होंने शत्रुओं के छक्के छुड़ा दिए थे इस तरह उन्होंने धर्म, जाति और राष्ट्र को नया जीवन दिया था    गुरु गोबिंद सिंह जी ने सिर्फ अपने महान उपदेशों के माध्यम से लोगों को सही दिशा दिखाई, बल्कि उन्होंने समाज में हो रहे अत्याचारों और अपराधों के खिलाफ भी विरोध किया एवं खालसा पंथ की स्थापना की, जो को सिख धर्म के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना के तौर पर अंकित है।

गुरु गोबिंद जी के जन्म को लेकर विद्धानों के अलग-अलग मत है, लेकिन ज्यादातर विद्धानों का मानना है कि उनका जन्म 5 जनवरी, 1666, पटना साहिब, बिहार में हुआ था। इनका बचपन का नाम गोबिन्द राय रखा गया इनके पिता नौवें गुरु श्री तेरा बहादुर जी कुछ समय बाद पंजाब लौट आए थे इसके बाद 4 साल की उम्र में वे अपने परिवार के साथ पंजाब में लौट आए और फिर वो जब 6 साल के हुए तब हिमालय की शिवालिक घाटी में स्थित चक्क ननकी में रहने लगे।  चक्क ननकी की स्थापना उनके पिता एवं 9वें सिख गुरु, गुरु तेग बहादुर सिंह ने की थी, जो कि आज आनंदपुर साहिब के नाम से जाना जाता है।

 गोबिन्द राय बचपन से ही स्वाभिमानी और शूरवीर थे घुड़सवारी करना, हथियार चलाना, साथियों की दो टोलियां बनाकर युद्ध करना तथा शत्रु को जीतने के खेल खेलते थे वे खेल में अपने साथियों का नेतृत्व करते थे उनकी बुद्धि बहुत तेज थी उन्होंने आसानी से हिन्दी, संस्कृत और फारसी भाषा का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया था

उन दिनों औरंगजेब के अत्याचार जोरों पर थे वह तलवार के जोर से हिन्दुओं को मुसलमान बना रहा था कश्मीर में भी हिन्दुओं को जबरदस्ती मुसलमान बनाया जा रहा था भयभीत कश्मीरी ब्राह्मण गुरु  तेग बहादुर जी के पास आए उन्होंने गुरु जी से हिन्दु धर्म की रक्षा के लिए प्रार्थना की गुरु  तेग बहादुर जी ने कहा कि इस समय किसी महापुरुष के बलिदान की आवश्यकता है पास बैठे बालक गोबिन्द राय ने कहा-‘ ‘ पिता जी, आप से बढ्कर महापुरुष और कौन हो सकता है तब गुरु तेग बहादुर जी ने- बलिदान देने का निश्चय कर लिया वे हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए दिल्ली पहुँच गए और वहाँ धर्म की रक्षा के लिए 11 नवम्बर 1675 को भारत की राजधानी दिल्ली के चांदनी चौक इलाके में गुरु तेग बहादुर सिंह जी ने अपना बलिदान दे दिया । फिर 29 मार्च 1676 को, महज 9 साल की छोटी सी उम्र में गुरु गोबिंद सिंह जी को औपचारिक रूप से सिखों का 10वां गुरु बनाया गया था। उन्होंने औरंगजेब के अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाई और हिन्दू धर्म की रक्षा का बीड़ा उठाया

  सन् 1699 में वैशाखी के दिन गुरु गोबिन्द राय जी ने आनन्दपुर साहिब में दरबार सजाया भरी सभा में उन्होंने बलिदान के लिए पाँच सिरों की मांग की गुरु की यह माँग सुनकर सारी सभा में सन्नाटा छा गया फिर एक-एक करके पाँच व्यक्ति अपना बलिदान देने के लिए आगे आए गुरु जी एक-एक करके उन्हें तम्बू में ले जाते रहे इस प्रकार उन्होंने पाँच प्यारों का चुनाव किया फिर उन्हें अमृत छकाया और .स्वयं भी उनसे अमृत छका इस तरह उन्होंने अन्याय और अत्याचार का विरोध करने के लिए खालसा पंथ की स्थापना की उन्होंने अपना नाम गोबिंद राय से गोबिन्द सिंह रख लिया

मुगल सेना से लड़ते-लड़ते गुरु जी चमकौर जा पहुंचे वहाँ उन्होंने अपने एक जाट शिष्य की हवेली को ही किला बना लिया चमकौर के युद्ध में गुरु जी के दोनों बड़े साहिबजादे, अजीत सिंह और जुझार सिंह शत्रुओं से लोहा लेते हुए वीरगति को प्राप्त हुए उनके दोनों छोटे साहिबजादा जोरोतर सिंह .और फतेह सिंह को सरहिन्द के सूबेदार ने पकड़ कर जीवित ही दीवार में चिनवा दिया था